यह कुंडली मिलान कैसे करता है?
वधू और वर की जन्म तारीख, स्थानीय समय और चुना हुआ जन्म स्थान लिया जाता है। इन्हीं विवरणों से चंद्र नक्षत्र, पाद, राशि और जरूरी भाव निकाले जाते हैं। फिर उत्तर भारतीय अष्टकूट, दक्षिण भारतीय और दूसरी प्रचलित पद्धतियों के नियम अलग-अलग लागू होते हैं।
एक पद्धति स्वीकार करे और दूसरी मना करे, तो दोनों को औसत में मिलाकर जबरन एक जैसा परिणाम नहीं बनाया जाता। हर पंक्ति पर उस पद्धति का नाम लिखा है जिससे वह नतीजा निकला है।
वधू और वर का क्रम क्यों जरूरी है?
कुछ नियम दिशात्मक हैं। तारा, वर्ण और कुछ भकूट या गण तालिकाएँ वधू से वर और वर से वधू की गिनती को एक जैसा नहीं मानतीं। इसलिए दोनों व्यक्तियों को स्पष्ट भूमिकाओं में भरना जरूरी है; क्रम बदलने से कुछ पंक्तियाँ बदल सकती हैं।
यह स्त्री या पुरुष के बारे में कोई दावा नहीं है; पारंपरिक तालिका में वधू और वर की भूमिकाएँ पहले से तय हैं। इसलिए परिणाम के साथ पद्धति और गिनती की दिशा, दोनों जानना जरूरी है।
अंक फैसला नहीं है
36 में से कुल अंक एक परंपरा का सार है, विवाह की भविष्यवाणी नहीं। अलग परंपराएँ अलग जाँच, रोक और अपवाद अपनाती हैं। इसीलिए हर परिणाम के साथ पद्धति का नाम और उसे दोबारा जाँचने लायक विवरण दिया गया है।
आपके जन्म विवरण किसी खाते या रिपोर्ट में सहेजे नहीं जाते। पेज रीफ़्रेश करते ही परिणाम मिट जाता है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
क्या केवल नाम से कुंडली मिलान हो सकता है?
नहीं। यह कैलकुलेटर नाम से नक्षत्र का अनुमान नहीं लगाता। सही जन्म विवरण या पहले से मालूम नक्षत्र और पाद चाहिए।
क्या 18 से अधिक अंक विवाह की गारंटी हैं?
नहीं। 18 एक प्रचलित तालिका की सीमा है, वैज्ञानिक गारंटी या सभी परंपराओं का साझा फैसला नहीं।
यह पेज कहाँ तक जवाब देता है: पद्धतियों, नक्षत्रों और स्रोतों के प्रचलित नाम नहीं बदले गए हैं, ताकि आप उन्हें पहचानकर जाँच सकें। यह पेज पारंपरिक नियम समझाता है; इसके परिणाम को वैज्ञानिक भविष्यवाणी या विवाह का फैसला न मानें।
